• कैसे इन सफल महिला उद्ययमियों ने सामाजिक रूढ़ि को तोड़ अपनी जगह तय की

    स्टार्टॅप के इस नये युग ने काम करने की जगह और तरीके की जैसे कायापलट सी कर दी है| ShethePeople की संपादक अमृता त्रिपाठी ने देश की चार उभरती महिला उद्ययमियों से जानने की कोशिश करी की ऐसी क्या वजह थी की उन्होने दफ़्तर छोड़ कर अपने सपनों का पीछा करने का निर्णय लिया| वे बात करती हैं पूल वॉलेट की स्मिता मिश्रा, मॉबिकविक की उपासना टकु, इंटेलीटॉट्स की शिवानी और पोप एक्सो की नम्रता बोस्तरोम से|उन्होने ने यह भी जाना के कैसे इन उद्ययमियों ने रास्ते में आई कई चुनौतियों का सामना किया, जैसे पुरुष प्रधान निवेशक समुदाय, मातृत्व की माँगे, और स्टार्टाप जीवन की गति||

    अपने वेंचर “पूल वॉलेट” के पीछे की सोच को स्मिता मिश्रा कुछ इस प्रकार बताती हैं:

    मैं एक ऐसा प्रॉडक्ट बनाना चाहती थी जो भारतीय जनता इस्तेमाल कर सके और जिससे आने वाले बदलाव को मैं देख सकु| इसी लिए मैं एक खर्चे विभाजित करने वाले प्लॅटफॉर्म की संस्थापना की| यह एक प्रकार का सोशियल नेटवर्क पियर-टू-पियर पेमेंट मंच भी है, जिससे आप अपने दोस्तों के साथ बाहर खाने से लेकर, घूमने, इवेंट प्लान करने, मूवीस जाने, पार्टी करने जैसे कई खर्चे ऑनलाइन बाँट सकते हैं, बिना अपने दोस्तों से लेनदेन की असुविधाजांक बात चीत किए||

    मातृत्व महिलाओं को विभिन्न तरीकों से बदलता है| अपनी स्टार्टॅप की कहानी से जुड़े  ऐसे ही पहलू से मिलाती हैं इंटेलीटॉट्स की शिवानी कपूर:

    कॉलेज के बाद मैने कॉर्पोरेट जॉब का सामान्य रास्ता चुनने का निर्णय लिया| पर माँ बनने के बाद, कहानी कुच्छ बदल गयी| उसने  मुझे अपने करियर, परिवार और खुद को मॅनेज करने के तरीके पर पुनर्विचार करने को मजबूर कर दिया; और मुझे पता है की यह हर महिला के साथ होता है|

    अगर आप एक प्री-स्कूल शुरू करना चाहते हैं, गुरगाओं भारत के उन दो टीन शहरों में से है जहाँ आप एक प्री-स्कूल घर से नहीं चला सकते| आपको एक बड़े रियल एस्टेट सेटप की ज़रूरत होती है, जो लगभग 1200 स्क्वेर फुट का हो| यहाँ हमने अपनी रचनात्मकता का प्रयोग किया, और एक स्कूल की दो मंज़िलें किराए पर ले कर वाहा से काम शुरू किया| हमने अपनी क्वालिटी और देखभाल के तरीके और पाठ्यक्रम पर ज़्यादा फोकस किया||

    ना केवल सोच, मातृत्व आपके जीवन में कई नयी चुनौतियाँ भी लेकर आता है| मोबिक्विक की उपासना टकु के साथ भी कुच्छ ऐसा हुआ:

    सभी महिलाएँ जब अपने जीवन में मातृत्व की भूमैका शुरू करती हैं, कार्यक्षत्र में दोबारा संक्रमण चुनौतियों से भरा होता है| मेरे लिए मोबिकुविक भी मेरे बच्चे के जैसे ही है| बच्चा होने के दूसरे महीने से ही मैं घर से काम और कुच्छ मीटिंग्स करना शुरू कर दिया था, हलाकी मैं काम पर वापस नहीं जेया पाई| शुरुआत के समय में समय बच्चा आप पर पूरतः निर्भर होता है| हमारे स्टरताप में आज कुच्छ 200 लोग काम करते हैं, और मैं पहली हूँ जिसने मातृत्व की भूमिका भी संभाल रखी है| मेरा मानना हैं के आप एक समय पर कई काम कर सकते हैं; मातृत्व का पहले 6 महीना से एक साल काफ़ी चुनौतीपूरवक होगा||

    जहाँ एक ओर महिला उद्ययमियों की संख्या में कुच्छ बढ़त हुई है, निवेशक समुदाय में महिलायें अभी भी कुच्छ कम हैं| नम्रता बोस्तरों अपने शुरुआती दीनो को याद करते हुए इस विषय पर रोशनी डालती हैं:

    पहले के विपरीत, आज जब आप इन स्टार्टॅप कॉन्फरेन्सस पर जाते हैं, तो आपको कई महिला उद्ययमी देखने को मिलती हैं| मुझे इस बात पर बहुत गर्व महसूस होता है के कही ना कही, कुच्छ स्तर तक इस क्षेत्र में होने वाले लिंग भेद का निवारण हो पाया है| हलाकी निवेशक समुदाय में यह . अभी . आ पाया है| . . है, मेरी सह-संस्थापक प्रियंका (जो खुद भी एक महिला हैं) और मैने मिल कर 12-18 महीनों में कुच्छ 60-70 पिच किए थे, जहाँ हमें बहुत कम महिला निवेशक मिली|

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